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दादाजी के विशाल पुस्तकालय का रहस्य

दादाजी के विशाल पुस्तकालय का रहस्य

दस साल के कबीर और उसकी आठ साल की छोटी बहन रिया को लुका-छिपी (छुपन-छुपाई) खेलना बहुत पसंद था। एक दिन, वे दोनों अपने दादाजी के पुराने घर के सबसे शांत और रहस्यमय हिस्से में पहुँच गए— दादाजी का विशाल पुस्तकालय! यह कमरा किसी पुरानी गुफा जैसा लगता था। यहाँ छत तक लकड़ी की बड़ी-बड़ी अलमारियां थीं, जिनमें सैकड़ों साल पुरानी किताबें सजी थीं। कमरे में पुरानी किताबों की सोंधी-सोंधी महक और एक अजीब सी खामोaशी थी। केवल खिड़की से आ रही हल्की पीली धूप ही वहां रोशनी कर रही थी। रिया छुपने के लिए कमरे के सबसे अंधेरे कोने में, एक बहुत बड़ी अलमारी के पीछे बैठ गई।

रहस्य:

अचानक, कमरे की खामोशी टूट गई। रिया को अपने सिर के ठीक ऊपर से कुछ बहुत ही अजीब और डरावनी आवाज़ें आने लगीं— फड़-फड़-फड़!

रिया ने चौंक कर ऊपर देखा, पर वहां सिर्फ घना अंधेरा था। तभी किताबों के बीच से एक बहुत ही धीमी, ठंडी सी आवाज़ आई, जैसे कोई कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो— फुस-फुस-फुस!

रिया के रोंगटे खड़े हो गए। वह घबराकर वहां से भागी और कबीर के पीछे छुप गई। "भ-भ-भइया... वहां अलमारी के पीछे कोई है! कोई फुसफुसा रहा है!" उसने कांपते हुए कहा। यह क्या हो रहा था? क्या दादाजी के इतने पुराने पुस्तकालय में सच में कोई भूत था?

बच्चों, क्या आप भी अंधेरे कमरे में ऐसी आवाज़ें सुनकर रिया की तरह डरे होते?

साहस:

कबीर भी अंदर से बहुत डर गया था, लेकिन उसने अपनी बहन का हाथ कसकर पकड़ा। दीवार पर टंगी पेंडुलम वाली पुरानी घड़ी डरावनी आवाज़ कर रही थी— टिक-टिक... टिक-टिक! दादाजी बाज़ार गए थे और उनका समय खत्म हो रहा था। किसी भी पल दादाजी लौट सकते थे, और अगर उन्होंने बच्चों को पुस्तकालय का सामान बिखेरते हुए देखा, तो बहुत डांट पड़ेगी!

कबीर ने गहरी सांस ली, अपनी मुट्ठी बांधी और कहा, "रिया, हम डरेंगे नहीं। हम बहादुर हैं! हम मिलकर पता लगाएंगे कि वहां क्या है।"

डर के मारे दोनों भाई-बहन के दिल बहुत ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहे थे— धड़क-धड़क! धड़क-धड़क!

चलो साथ में आवाज़ निकालते हैं - धड़क-धड़क! (अपने दोनों हाथ छाती पर रखकर महसूस करो)

डर की स्थिति:

दोनों दबे पाँव, बिना आवाज़ किए अलमारी की तरफ बढ़ने लगे। उनके कदमों की हल्की सी आवाज़ गूंज रही थी— खट-खट-खट!

अचानक, जैसे ही वे अलमारी के पास पहुँचे, एक भयानक बात हुई! किताबों के पीछे से दो चमकती हुई पीली आँखें दिखाई दीं। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, एक बहुत बड़ी, काली और खौफनाक परछाई तेज़ी से उनके ऊपर से उड़ती हुई गुज़री और पूरे कमरे में एक डरावनी आवाज़ गूंज उठी— हूहू-हूहू!

"बचाओ! भूत!" रिया चीख पड़ी और दोनों ने डर के मारे ज़मीन पर बैठकर अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।

क्या आपको लगता है वो सही कर रहे हैं? या उन्हें दरवाजा खोलकर तुरंत बाहर भाग जाना चाहिए?

सच का पता:

पूरे एक मिनट तक कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। जब कबीर ने धीरे से अपनी एक आँख खोली, तो उसने जो देखा, उससे उसकी जान में जान आ गई। वहां कोई डरावना भूत नहीं था! अलमारी के पीछे वाली छोटी सी खिड़की खुली रह गई थी, जिससे बाहर की तेज़ हवा अंदर आ रही थी और पुरानी किताबों के पन्ने उड़ रहे थे— सर-सर-सर-सर! यही वह फुसफुसाहट थी!

और वह खौफनाक परछाई? वह एक बहुत ही सुंदर, सफेद रंग का बड़ा सा उल्लू था, जो रास्ता भटककर खिड़की से अंदर आ गया था और अलमारी के ऊपर बैठा उन्हें ही घूर रहा था।

चुनौती:

कबीर और रिया अपनी ही बेवकूफी पर ज़ोर से हंस पड़े। लेकिन तभी उल्लू ने अपनी चोंच से एक पुराना, सुनहरा चमचमाता हुआ कागज़ नीचे गिराया— छप!

कबीर ने वह कागज़ उठाया। उस पर संस्कृत के श्लोक जैसी एक पुरानी पहेली लिखी थी। कागज़ के नीचे लाल अक्षरों में लिखा था: "इस पहेली को सुलझाओ, तभी गुप्त ज्ञान का दरवाज़ा खुलेगा।"

अब उनके सामने यह रहस्यमय चुनौती थी:

"मैं कोई पेड़ नहीं, पर मेरे पास पत्ते (पन्ने) हैं।

मेरे पास आवाज़ नहीं, पर मैं तुम्हें हज़ारों कहानियां सुनाती हूँ।

मुझे जितना बांटोगे, मैं उतनी ही बढ़ती जाऊंगी।

बताओ, मैं क्या हूँ?"

बच्चों, इस पहेली का जवाब जल्दी बताओ!

समाधान:

दोनों भाई-बहन ने अपना दिमाग तेज़ी से दौड़ाया। कबीर ने सोचा— "पेड़ नहीं, पर पत्ते हैं? आवाज़ नहीं, पर कहानियां सुनाती है?"

तभी रिया को दादाजी की बताई हुई एक बहुत पुरानी कहावत याद आ गई। "भइया! दादाजी हमेशा चौपाल पर कहते हैं कि विद्या और ज्ञान बांटने से ही बढ़ता है!"

रिया खुशी से उछल पड़ी और ज़ोर से बोली, "किताब! इसका जवाब 'किताब' है!"

जैसे ही रिया ने सही जवाब दिया, पुस्तकालय में एक जादू हुआ! अलमारी का एक भारी हिस्सा अपने आप खिसकने लगा— चर्र-चर्र-चर्र! और किताबों के पीछे एक गुप्त दरवाज़ा खुल गया।

खुशी का अंत:

उस गुप्त जगह के अंदर एक बहुत ही सुंदर, नीले रंग की रोशनी से चमकती हुई किताब मखमली कपड़े पर रखी थी। यह दादाजी की सबसे खास जादुई 'बुद्धि देने वाली किताब' थी! उल्लू ने खुशी से अपने बड़े-बड़े पंख फड़फड़ाए— फड़-फड़! और खुली खिड़की से बाहर नीले आसमान में उड़ गया।

ठीक उसी समय, बाहर वाले दरवाज़े से दादाजी की आवाज़ आई, "कबीर, रिया! मैं आ गया!"

समय पूरा होने से ठीक पहले, दोनों बच्चों ने न सिर्फ एक बड़ा रहस्य सुलझा लिया था, बल्कि उन्हें एक जादुई इनाम भी मिल गया था। और इस तरह, उनके डर की जगह अपार खुशी और ज्ञान ने ले ली!

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