
देव को गाँव के पुराने और रहस्यमयी स्थानों की खोजबीन करना बहुत पसंद था। उसकी आठ साल की छोटी बहन मीरा भी हमेशा उसकी साथी बनती थी। एक दिन, भयंकर गर्मियों के बाद, वे दोनों गाँव की पुरानी 'बावड़ी' (सीढ़ीदार कुएं) के पास खेल रहे थे। यह बावड़ी बहुत गहरी थी और इसकी सीढ़ियां अंधेरे में नीचे की ओर जाती थीं।
आसमान में अचानक घने काले बादल घिरने लगे। ठंडी हवा तेज़ हो गई और पेड़ों के सूखे पत्ते सर-सर... सर-सर की आवाज़ करते हुए उड़ने लगे। मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक आने लगी थी। यह इस बात का संकेत था कि मानसून की पहली और सबसे भारी बारिश किसी भी पल शुरू हो सकती है।
अचानक बावड़ी के गहरे, अंधेरे हिस्से से एक अजीब सी आवाज़ गूंजी...
छप-छप... गुड़-गुड़... छप-छप...
यह क्या हो रहा था? देव ने सतर्क होकर कुएं के अंदर झांका। नीचे जमे हुए काले पानी में उसे दो लाल रंग की चमकती हुई भयानक आँखें दिखाई दीं! वे आँखें पानी के अंदर से उन्हें ही घूर रही थीं।
(बच्चों, क्या आप भी देव और मीरा की तरह डरे होते? अगर आपको अंधेरे कुएं में लाल आँखें दिखें, तो क्या आप भाग जाते?)
मीरा का दिल धड़क-धड़क करने लगा। उसने देव का हाथ कसकर पकड़ लिया और कांपते हुए बोली, "भैया, चलो यहाँ से भाग चलते हैं! अंदर पानी का कोई भयानक राक्षस है!"
लेकिन देव साहसी था। तभी आसमान में बिजली कड़क-कड़क चमक उठी। समय का बहुत बड़ा दबाव था। अगर मानसून की भारी बारिश शुरू हो गई, तो बावड़ी पानी से पूरी तरह भर जाएगी। जो कुछ भी नीचे फंसा था, वह हमेशा के लिए गहरे पानी में डूब जाएगा। बारिश शुरू होने से पहले उन्हें उस चीज़ को बाहर निकालना ही था। हिम्मत करके उन्होंने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और बावड़ी की पुरानी, फिसलन भरी सीढ़ियों से नीचे उतरने का फैसला किया।
वे धीरे-धीरे अंधेरे में नीचे उतर रहे थे। सीढ़ियों पर काई लगी थी और अजीब सी नमी की गंध आ रही थी। लेकिन तभी... एक और ज़ोरदार आवाज़ आई—छपाक! पानी उछला और वे लाल आँखें तेज़ी से उनकी तरफ बढ़ने लगीं।
(चलो बच्चों, हम सब साथ मिलकर डरावनी आवाज़ निकालते हैं और कांपने का नाटक करते हैं - गुड़-गुड़-गुड़!)
दोनों भाई-बहन डर के मारे एक पल के लिए रुक गए। लेकिन जब वह चीज़ सीढ़ियों के पास आई, तो सच का पता चला! पास जाकर देखा तो वह कोई डरावना राक्षस नहीं था, बल्कि एक बड़ा सा, प्यारा कछुआ था!

उस कछुए के ऊपर एक पुरानी मछली पकड़ने वाली जाली उलझी हुई थी। कछुए की पीठ पर एक लाल रंग का चमकीला पत्थर फंसा हुआ था, जो अंधेरे में लाल आँखों की तरह चमक रहा था। बेचारा कछुआ जाली में फंसा होने के कारण बाहर नहीं निकल पा रहा था और पानी में छप-छप कर रहा था।
"ओह! यह तो मुसीबत में है," मीरा ने राहत की सांस लेते हुए कहा। दोनों ने मिलकर टीमवर्क दिखाया। देव ने जाली को एक तरफ से पकड़ा और मीरा ने दूसरी तरफ से। बहुत कोशिश के बाद उन्होंने कछुए को आज़ाद कर दिया।
कछुए ने खुश होकर अपनी पीठ झटकाई और वह लाल चमकता पत्थर सीढ़ियों पर गिर गया। लेकिन जैसे ही देव ने वह पत्थर उठाया, पत्थर से एक तेज़ रोशनी निकली और बावड़ी की दीवार पर एक पहेली उभर आई। यह बिल्कुल वैसी ही पहेली थी, जैसी उनकी दादी माँ अक्सर चौपाल पर सुनाया करती थीं।
अब उनके सामने यह पहेली थी, जिसे बारिश की पहली बूंद गिरने से पहले सुलझाना था, वरना कुएं का रास्ता बंद हो जाता:
"मेरे बिना अन्न नहीं, मेरे बिना जीवन नहीं।
रंग मेरा कोई नहीं, पर मैं गिरूँ आसमान से तो धरती मुस्काती।
बुझाऊँ सबकी प्यास, बताओ मैं हूँ क्या आस?"
(इस पहेली का जवाब जल्दी बताओ बच्चों! क्या यह हवा है, या फिर कुछ और?)
देव और मीरा सोचने लगे। बाहर बादलों की गड़गड़ाहट और तेज़ हो गई थी—गड़-गड़-गड़।
"भैया, जो प्यास बुझाए और आसमान से गिरे... वो क्या हो सकता है?" मीरा ने सोचते हुए कहा।
तभी मीरा को समझ आया! वह खुशी से उछल पड़ी और ज़ोर से बोली, "पानी! इसका जवाब है पानी (जल)!"
जैसे ही मीरा ने सही जवाब दिया, दीवार की चमक गायब हो गई। तभी आसमान से बारिश की पहली बड़ी बूंद टप से उस लाल पत्थर पर गिरी।
चमत्कार हुआ! पत्थर का लाल रंग बदलकर एक बहुत ही सुंदर, ठंडी नीली रोशनी में बदल गया। वह कछुआ धीरे से पानी में तैरता हुआ नीचे चला गया, मानो उन्हें धन्यवाद कह रहा हो।
और इस तरह, देव और मीरा ने अपनी बहादुरी और सूझ-बूझ से न सिर्फ एक बेज़ुबान जानवर की जान बचाई, बल्कि उन्हें दादी माँ की कहानियों वाला 'जल को शुद्ध करने वाला चमत्कारी पत्थर' भी मिल गया। इस पत्थर को जिस भी कुएं या मटके में रखा जाता, उसका पानी हमेशा मीठा और एकदम साफ हो जाता था।
बाहर बारिश झमाझम शुरू हो चुकी थी। देव और मीरा बारिश में भीगते और पानी में छप-छप कूदते हुए, अपने जादुई इनाम के साथ खुशी-खुशी घर लौट आए।