
गाँव की पुरानी चौपाल पर खड़ा वो विशाल बरगद का पेड़ दिन में जितना शांत लगता था, शाम ढलते ही उतना ही रहस्यमयी हो जाता था। नौ साल की साहसी आर्या, जिसे खौफनाक कहानियों से बिलकुल डर नहीं लगता था, और उसकी परछाई बनकर चलने वाली सात साल की छोटी बहन आरना, उसी बरगद की जटाओं से झूला झूल रही थीं।
सूरज ढल चुका था और आसमान में गहरा बैंगनी अंधेरा छाने लगा था। बरगद की लंबी-लंबी जटाएँ अब अंधेरे में किसी बड़े दानव के लटकते हुए हाथों जैसी लग रही थीं। कुछ ही देर में गाँव के सरपंच और बड़े-बुज़ुर्ग यहाँ पंचायत की बैठक के लिए आने वाले थे।
तभी, सर्द हवा का एक तेज़ झोंका आया और पेड़ के सूखे पत्ते आपस में टकराने लगे— सन-सन... सरर-सरर!
अचानक, उस सन्नाटे को चीरती हुई बरगद के घने अंधेरे हिस्से से एक खौफनाक आवाज़ गूंजी।
(चलो बच्चों, हम सब भी एकदम चुप हो जाते हैं और वो डरावनी आवाज़ सुनते हैं...)
खुरच-खुरच... खुर-खुर!
ऐसा लगा जैसे कोई बड़े और नुकीले नाखूनों से पेड़ के तने को अंदर से खुरच रहा हो। और फिर... एक बहुत ही धीमी, दर्द भरी रोने की आवाज़ आई। आरना के रोंगटे खड़े हो गए। उसने कांपते हुए आर्या के कुर्ते का कोना कसकर पकड़ लिया।
"दी... दीदी, यह आवाज़ कैसी है? क्या पेड़ के अंदर कोई राक्षस है?" आरना की आवाज़ डर से कांप रही थी।
आर्या का दिल भी धड़क-धड़क करने लगा था। उसने दूर सड़क की ओर देखा। पंचायत के लोगों के आने की लालटेन की रोशनी दिखाई देने लगी थी। समय का दबाव बहुत बड़ा था! अगर सरपंच जी और गाँव वालों ने यह डरावनी आवाज़ सुन ली, तो बैठक रद्द हो जाएगी और सब मान लेंगे कि उनका प्यारा बरगद का पेड़ शापित हो गया है।
"हमें पंचायत के पहुँचने से पहले इस राक्षस को भगाना होगा, आरना!" आर्या ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
(बच्चों, क्या आप आर्या की जगह होते तो उस अंधेरे पेड़ पर चढ़ने की हिम्मत करते?)
आर्या ने बरगद की सबसे मोटी जटा पकड़ी और आवाज़ की दिशा में ऊपर चढ़ने लगी। जैसे-जैसे वह तने के पास पहुँची, वह रोने की आवाज़ और भी भयानक लगने लगी। पेड़ के बीचों-बीच एक बड़ा, गहरा और अंधेरा कोटर (Hollow) था।
खुर-खुर... खुर-खुर!
आवाज़ बिल्कुल उसी कोटर के अंदर से आ रही थी। आर्या ने हिम्मत जुटाई, अपना हाथ उस घने अंधेरे कोटर के अंदर डाला और...
"आह!" आर्या चीख पड़ी और झटके से अपना हाथ बाहर निकाल लिया।
नीचे खड़ी आरना डर के मारे रोने लगी। "क्या हुआ दीदी? क्या राक्षस ने काट लिया?"
आर्या की सांसें तेज़ चल रही थीं। उसने अपना हाथ देखा। उसके हाथ पर कुछ चिपचिपा और गीला-गीला लगा था। टॉर्च की हल्की रोशनी में उसने देखा—वह लाल रंग का था!
(बाप रे! बच्चों, क्या वह खून था? क्या सच में अंदर कोई भयानक राक्षस था?)
आर्या डरी, लेकिन फिर उसने उस लाल रंग को ध्यान से देखा और सूंघा। अचानक उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। "आरना, डरो मत! यह खून नहीं... यह तो पके हुए जामुन का रस है!"
उसने फिर से कोटर में झांका। अंदर कोई राक्षस नहीं था। वहाँ एक छोटा सा, गोल-मटोल उल्लू का बच्चा था! बेचारे उल्लू ने बहुत सारे पके हुए जामुन खा लिए थे और जामुन का चिपचिपा रस उसकी आँखों में चला गया था। जलन के कारण वह रो रहा था और अपनी आँखें मलने के लिए पेड़ की लकड़ी खुरच रहा था।

सच का पता चलते ही सारा डर हवा हो गया! आर्या ने जल्दी से अपनी पानी की बोतल निकाली और उस छोटे उल्लू की आँखों पर प्यार से छप-छप पानी डाला। उल्लू को बहुत राहत मिली और वह खुशी से हूट-हूट करने लगा।
डरावनी आवाज़ बंद हो गई! लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
जैसे ही उल्लू शांत हुआ, बरगद के पेड़ से एक बहुत ही गहरी, गूंजती हुई जादुई आवाज़ आई, मानो पूरा पेड़ बोल रहा हो— "साहसी बच्चियों! तुमने बिना डरे मेरे छोटे दोस्त की मदद की। अब इस प्राचीन पहेली को सुलझाओ, और मेरा जादुई इनाम पाओ।"
पेड़ के तने पर नीली रोशनी में एक पहेली चमकने लगी।
अब उनके सामने यह पहेली थी, और पंचायत के लोग बस पहुँचने ही वाले थे:
"सबको मैं ज़मीन से जकड़े रखूँ, पर रस्सियाँ नहीं।
मैं हमेशा गहरे अंधेरे में रहूँ, पर मेरी कोई परछाईं नहीं।
मेरे बिना यह विशाल बरगद भी खड़ा रह न पाए,
बताओ मैं क्या हूँ, जो मिट्टी के अंदर छुप जाए?"
(इस पहेली का जवाब जल्दी बताओ बच्चों! पेड़ का वह कौन सा हिस्सा है जो मिट्टी के अंदर अंधेरे में रहता है?)
आरना, जो अब बिल्कुल नहीं डर रही थी, खुशी से उछल पड़ी। "दीदी! जो ज़मीन के अंदर रहती हैं... वो तो 'जड़ें' (Roots) हैं!"
जैसे ही आरना ने "जड़ें" कहा, बरगद की एक बहुत पुरानी, मोटी जड़ चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठ गई। उसके ठीक नीचे एक चमकता हुआ, सुनहरा-नीला बीज रखा था।
तभी सरपंच जी और गाँव वाले वहाँ पहुँच गए।
आर्या ने जल्दी से वह बीज उठाया। जादुई आवाज़ फिर गूंजी, "यह एक जादुई बीज है। इसे वहीं बोना जहाँ पानी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो।"
गाँव में कई दिनों से बारिश नहीं हुई थी और चौपाल के पास वाला पुराना कुआँ सूख गया था। आर्या और आरना ने दौड़कर उस बीज को सूखे कुएँ के पास बो दिया।
(और पता है बच्चों, अगली सुबह क्या चमत्कार हुआ?)
जैसे ही सूरज निकला, उस बीज की जगह एक बहुत बड़ा, हरा-भरा जादुई फलों का पेड़ उग आया था! और सबसे हैरानी की बात... उस पेड़ की जड़ों ने कुएँ के अंदर से ज़मीन का मीठा पानी खींच लिया था। सूखा कुआँ ऊपर तक ठंडे, मीठे पानी से भर गया था और छल-छल कर रहा था।
आर्या और आरना की बहादुरी से न केवल रहस्य सुलझा, बल्कि उनके गाँव को एक ऐसा जादुई इनाम मिला जिसने सबकी प्यास बुझा दी।